Friday, April 24, 2009

परोपकार


आज एक नई बात देखी शहर की सरपट भागती जिन्दगी और हैदराबाद की चिलचिलाती...... बदन को झुलसाती हुई गर्मी में जब किसी को किसी के लिए फुर्सत नही होती .... तब एक आदमी को राह चलते लोगों को पानी के पकेट्स बाटते देखा ....लोगों को रोक कर ... उनसे पानी पीने कि विनती करता हुआ ... सच बहुत अच्छा लगा ये देख कर कि अभी भी इंसानियत और दया नाम कि चीजे हैं इस दुनिया में ..... वरना इस स्वार्थी दुनिया में जहाँ लोगों के पास अपने माँ बाप के लिए वक्त नही है ... दूसरों कि कौन सोचता है ....

4 comments:

  1. नमस्कार,
    इसे आप हमारी टिप्पणी समझें या फिर स्वार्थ। यह एक रचनात्मक ब्लाग शब्दकार के लिए किया जा रहा प्रचार है। इस बहाने आपकी लेखन क्षमता से भी परिचित हो सके। हम आपसे आशा करते हैं कि आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे कि हमने आपकी पोस्ट पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की।
    आपसे अनुरोध है कि आप एक बार रचनात्मक ब्लाग शब्दकार को देखे। यदि आपको ऐसा लगे कि इस ब्लाग में अपनी रचनायें प्रकाशित कर सहयोग प्रदान करना चाहिए तो आप अवश्य ही रचनायें प्रेषित करें। आपके ऐसा करने से हमें असीम प्रसन्नता होगी तथा जो कदम अकेले उठाया है उसे आप सब लोगों का सहयोग मिलने से बल मिलेगा साथ ही हमें भी प्रोत्साहन प्राप्त होगा। रचनायें आप shabdkar@gmail.com पर भेजिएगा।
    सहयोग करने के लिए अग्रिम आभार।
    कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
    शब्दकार
    रायटोक्रेट कुमारेन्द्र

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  2. aapne bilkul sahi kaha ...aisa bahut kam hi log hain duniyan mein

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  3. Mishra jee aaj bhi dharti aise logo se khaali nahi hai ....haa itana jarur hai ki aise log kam ho gaye hai ..ham aur aap unki kataar me jud sakte hai ...

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  4. उस अनदेखे- अनजाने सज्जन को प्रणाम.

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